नयी दिल्ली,: 13 जून का दिन हर साल कैलेंडर में आता है, लेकिन 1997 का 13 जून दक्षिण दिल्ली के उपहार सिनेमाघर में फिल्म ‘बॉर्डर’ देखने गए दर्जनों परिवारों के लिए कभी न भूलने वाली त्रासदी बन गया। यह एक ऐसी शाम थी, जब मनोरंजन की उम्मीद लेकर पहुंचे लोग जिंदा लौट नहीं सके।
शाम के शो के दौरान जब सिनेमा हाल के अंदर लोग फिल्म का आनंद ले रहे थे, तभी बिल्डिंग के ट्रांसफॉर्मर कक्ष में आग लग गई, जो कुछ ही मिनटों में पूरी इमारत में फैल गई। उस समय थिएटर के दरवाजे या तो बंद थे या अवरुद्ध, जिससे लोग बाहर नहीं निकल सके। कई लोग धुएं और दम घुटने से मौके पर ही दम तोड़ बैठे। इस हादसे में 59 लोगों की जान चली गई और 100 से अधिक घायल हुए, जिनमें अधिकांश महिलाएं और बच्चे थे।
यह घटना केवल आग लगने की नहीं थी, बल्कि लापरवाही, भ्रष्टाचार और सिस्टम की विफलता की भी साक्षी बनी। बाद में की गई जांच से यह सामने आया कि सिनेमाघर में आग से सुरक्षा के पर्याप्त उपाय नहीं थे, आपातकालीन निकास मार्ग बंद थे और अग्निशमन यंत्रों का रखरखाव भी नहीं किया गया था।
इस हादसे के बाद पीड़ित परिवारों ने “अवाम (AVUT)” नामक संगठन बनाया और लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। सुरक्षा मानकों, जवाबदेही और पीड़ितों के हक की मांग करते हुए यह लड़ाई भारत की न्याय व्यवस्था में सबसे लंबे समय तक चलने वाले मामलों में से एक बन गई।
सालों की कानूनी प्रक्रिया के बाद मुख्य दोषियों को सजा तो मिली, लेकिन बहुत से परिवार आज भी न्याय अधूरा मानते हैं।
उपहार कांड ने देश में सार्वजनिक स्थलों पर अग्नि सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए और आज भी यह घटना एक कड़वी सीख के रूप में याद की जाती है। हर साल 13 जून को पीड़ित परिवार अपने प्रियजनों की याद में श्रद्धांजलि सभा आयोजित करते हैं।




